- रागायन की नींव ग्वालियर घराने के विलक्षण आचार्य पंडित सीतारामशरण जी महाराज ने सन् 1990 के आसपास रखी। रीवा जिले के रघुनाथपुर से बाल ब्रह्मचारी रूप में ग्वालियर आकर उन्होंने सिद्धपीठ श्री गंगादासजी की बड़ी शाला को अपना आश्रय बनाया, जहाँ भजन-कीर्तन और सेवा की साधना के बीच उनका मन संगीत की ओर आकृष्ट हुआ। ग्वालियर घराने के वरिष्ठ गायक पण्डित कृष्णराव पण्डित के सान्निध्य में उन्होंने दीर्घकाल तक संगीत-शिक्षा प्राप्त की और बाद में शंकर गंधर्व महाविद्यालय में संगीत-आचार्य बने। उनके मार्गदर्शन में तैयार हुए अनेक शिष्य आज भारतीय संगीत जगत के प्रतिष्ठित नाम हैं और रागायन की सक्रियता का प्रमुख आधार भी। 10 जून 2007 को उनके देवलोकगमन के बाद संस्था कुछ समय मंद पड़ी, पर उनके शिष्यों ने गुरु-परम्परा और स्मृति को संबल बनाकर रागायन को पुनः सक्रिय और विस्तृत रूप में खड़ा किया। आज संस्था का संचालन महंत स्वामी रामसेवकदास जी के मार्गदर्शन में हो रहा है, जो मंदिर परम्परा और संगीत-साधना दोनों के ज्ञाता होने के साथ रागायन की आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
- रागायन से ग्वालियर के लगभग सभी प्रमुख संगीतज्ञ जुड़े हैं पण्डित श्रीराम उमड़ेकर, अनंत महाजनी, पण्डित उमेश कंपूवाले, पण्डित सुनील पावगी, महेशदत्त पाण्डेय, टीकेंद्रनाथ चतुर्वेदी, श्यामलाल साहू, डॉ. मुकेश सक्सेना, संजय देवले, विदुषी साधना गोरे, डॉ. वीणा जोशी, नवनीत कौशल, अविनाश महाजनी, डॉ. विनय विन्दे, पांडुरंग तैलंग, डॉ. विकास विपट आदि, जिनमें से अधिकांश पण्डित सीतारामशरण जी के शिष्य हैं। नई पीढ़ी के कलाकार रागायन से जुड़कर गुरु परम्परा, मंच-संस्कार और सांगीतिक अनुशासन का अनुभव प्राप्त करते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
- संस्था का आरंभ उन अनौपचारिक रात्रि-संगीत सभाओं से हुआ, जब प्रत्येक शनिवार गंगादासजी की बड़ी शाला में सारी रात संगीत-साधना होती थी और पण्डित कृष्णराव शंकर पण्डित, पण्डित बालाभाऊ उमड़ेकर, पण्डित राजाभैया पूछवाले, पण्डित बालासाहब पूछवाले, पण्डित एकनाथ सारोलकर, डॉ. प्रभाकर लक्ष्मण गोहदकर, सुरंगे साहब, नारायण प्रसाद रतौनिया, रामचंद्र तैलंग जैसे मूर्धन्य कलाकार अपनी कला का सारा तेज समर्पित करते थे। दिनांक 25 नवम्बर, 1990 को रागायन ने विधिवत संस्था रूप ग्रहण किया और तभी से यह ग्वालियर की सांगीतिक संस्कृति में अपनी सतत उपस्थिति बनाए हुए है।
- रागायन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी नियमितता, सातत्यपूर्ण साधना और सदस्यों का अद्भुत सहयोग है। संस्था आर्थिक रूप से सीमित और संसाधनों की दृष्टि से कमजोर होते हुए भी इतने वर्षों से सक्रिय है, क्योंकि हर आयोजन, हर सभा, हर उत्सव संस्था के सदस्यों, गुरुभाइयों और संगीत-प्रेमियों के निस्वार्थ योगदान से संभव होता है। यही सामूहिकता रागायन की वास्तविक शक्ति है और इसकी निरंतरता का आधार भी।
- हर माह आयोजित होने वाली संगीत-सभाओं में तीन-चार कलाकारों की प्रस्तुतियाँ होती हैं, जिसमें नवोदित कलाकारों को मंच प्रदान किया जाता है और देशभर के वरिष्ठ आमंत्रित संगीतज्ञ भी अपनी कला से सभाओं को समृद्ध करते हैं। इसके अतिरिक्त दो प्रमुख वार्षिक समारोह - 10 जून को पण्डित सीतारामशरण जी महाराज की पुण्यतिथि और 25 नवम्बर को स्थापना दिवस ग्वालियर के संगीत-इतिहास के महत्वपूर्ण पर्व बन चुके हैं। इन आयोजनों में पण्डित किशन महाराज, पण्डित जगदीश प्रसाद, एल.के. पण्डित, विदुषी मीता पण्डित, सुचिस्मिता दास, पण्डित राजा काले, रघुनाथ पणशीकर, रीतेश-रजनीश मिश्र, आदित्य मोदक, सुधाकर देवले, राजेंद्र प्रसन्ना, भुवनेश कोमकली, विदुषी कल्पना झोकरकर, नरेश मल्होत्रा जैसे कई दिग्गज कलाकार अपनी उपस्थिति से मंच को अलंकृत कर चुके हैं। कार्यशालाएँ, व्याख्यान और संगोष्ठियाँ रागायन को एक सशक्त संगीत-संस्थान का रूप देती हैं। रागायन की सभाएँ केवल संगीत कार्यक्रम नहीं, बल्कि सांगीतिक संस्कार का प्रवाह हैं। यहाँ परम्परा की गहराई और नवाचार की ऊर्जा साथ-साथ बहती है, जिससे संगीत की निरंतरता और उसकी जीवंत परम्परा सुरक्षित रहती है।
- मध्यप्रदेश शासन 'रागायन' को विगत तीन दशकों से भी अधिक समय से भारतीय संगीत एवं कला के संवर्धन, संरक्षण एवं प्रचार सहित, श्रेष्ठ कलानुशासन तथा उत्कृष्ट सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अर्जित उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय राजा मानसिंह तोमर सम्मान वर्ष 2025 से सादर विभूषित करता है।